आज तक’ में गैया…पत्रकारिता की मैया….दैया रे दैया….!

Nothing illustrates the insidious role of a large section of media in promoting "Hindutva". In other words, a fascist state. Just read this:

‘आज तक’ में गैया…पत्रकारिता की मैया….दैया रे दैया….!

Written by बर्बरीक | Published on: August 20, 2016
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बाबा रामदेव क्या कम थे जो सबसे तेज़ ”आज तक” भी मैदान में कूद पड़ा ! काफ़ी दिनों से हर समस्या का इलाज गोबर और गोमूत्र बताने का अभियान चल रहा है, लेकिन अब न्यूज़ चैनलों ने भी इसका झंडा बुलंद कर दिया है। गाय इन दिनों उन्हें बहुत लुभा रही है। आये दिन गाय की महिमा कुछ इस तरह बखानी जाती है जैसे गाय धरती पर पैदा नहीं होती, "आन रास्ते" सीधे स्वर्ग से उतर आती है !

16 अगस्त को दोपहर साढ़े तीन बजे ”आज तक” पर एक कार्यक्रम दिखाया गया – ‘गाय एक- वरदान अनेक’। इस कार्यक्रम में यहाँ तक बताया गया कि गोबर में लक्ष्मी और गोमूत्र में तमाम पवित्र नदियों का जल होता है। यह भी दावा किया गया कि पंचगव्य से धन की कमी दूर होती है। काश रघुराम राजन इसे समझ पाते तो भारत का रिज़र्व बैंक गले तक सोने-चाँदी में डूबा रहता। करना क्या था… गोबर और गोमूत्र से बना पंचगव्य ही तो पीना था ! साथ में बैंक के अधिकारियों और कर्मचारियों को भी पिला देना था, बस ! लेकिन नहीं किया। अब ”आज तक” देखकर दर्शक अगर रघुराम राजन को मूर्ख माने तो ग़लत क्या है ?

बहरहाल यहाँ बात सोशल मीडिया में तैरती एक तस्वीर की हो रही है। कार्यक्रम के प्रसारण का अता-पात नहीं है (किसके पास फ़ुर्सत है कि लगातार चैनल देखे) लेकिन जो कुछ भी पर्दे पर है वह बताता है कि पत्रकारिता में पंचगव्य का नशा सिर चढ़कर बोल रहा है। तस्वीर से साफ़ है कि गाय को एक पवित्र और विशिष्ट प्राणी बताने की कोशिश है, लेकिन इस उत्साह में विज्ञान की ओर से झूठी गवाही देने का पाप भी किया गया है। ज़रा तस्वीर पर गौ़र करें, कहा जा रहा है-

  1. गाय की कृपा विज्ञान भी मानता है.

2. गाय एकमात्र प्राणी है जो आक्सीजन ही ग्रहण करता है और आक्सीजन ही छोड़ता है।

इन बातों का आधार क्या है ? गाय की ”कृपा” विज्ञान भी मानता है इसका क्या अर्थ हुआ ? क्या किसी राष्ट्रीय या अंतरराष्ट्रीय विज्ञान कान्फ्रेंस में गाय के प्रति कृतज्ञता ज्ञापन किया गया ? अगर ”आज तक” के प्रोड्यूसर को पता है तो छिपा कर न रखे। बताए। यह एक्सक्लूसिव ख़बर है !

फिर आक्सीजन ग्रहण करने और छोड़ने की बात तो और ज़बरदस्त है। हिंदीपट्टी के स्कूलों में गाय पर निबंध लिखे बिना किसी को मुक्ति नहीं मिलती, लेकिन ऐसा दावा तो आज तक किसी ने नहीं किया। सच्चाई यह है कि गाय ही नहीं, तमाम जानवर जो साँस छोड़ते हैं, उसमें कई गैस होती हैं, ऑक्सीजन भी होती है। इंसानों के साथ भी ऐसा ही है। इस प्रक्रिया में थोड़ा बहुत फ़र्क़ होता है, लेकिन ऐसा नहीं कि गाय केवल आक्सीजन छोड़ती है जैसा कि ”आज तक” का दावा है। नीचे के बक्से में देख सकते हैं कि साँसों के आने-जाने के तिलस्म में और क्या-क्या है..

oxygen

बहरहाल, बड़ा सवाल यह है कि क्या ”आज तक” के संपादक नंबर एक की कुर्सी के लिए कुछ भी करने के लिए तैयार हैं। पिछले कुछ समय से लगातार शीर्ष पर रहना उसके लिए मुश्किल हो रहा है, लेकिन इसके लिए तथ्यों की बलि देना कहाँ तक उचित है। ”आज तक” के संपादक सुप्रिय प्रसाद यह कहकर नहीं बच सकते कि यह सब चैनल के कार्यक्रम ”धर्म” में दिखाया जाता है। क्या धर्म बेवकूफ़ बनाने का धंधा है ?

क्या "आज तक” अपने फ़ायदे के लिए धर्म के नाम पर अंधविश्वासों में धँसी जनता को और गहरे डुबोाने का पाप नहीं कर रहा है ? ( तमाम और चैनल भी कर रहे हैं) अंधविश्वास फैलाना क़ानून की नज़र में जुर्म है, लेकिन ”आज तक” के संपादकों की ख़ुशकिस्मती और देश का दुर्भाग्य है कि क़ानून की इस धारा का इस्तेमाल करने का हौसला व्यवस्था में नहीं है। यह कहें कि पूरी व्यवस्था ही अंधविश्वास में डूबी है।

वैसे, इस कार्यक्रम के प्रोड्यूसर और संपादकों को चाहिए कि नोएडा फ़िल्मसिटी के गंधाते नाले से सटी टीवी टुडे की बिल्डिंग को दुर्गंधमुक्त करने में अपना योगदान दें। वे अपने मालिक अरुण पुरी को बताएँ कि अगर इमारत की हर मंज़िल पर गौशाला खोल दी जाए तो इतनी ऑक्सीजन पैदा होगी कि दुर्गंध का नामो निशान नहीं बचेगा और वहाँ काम करने वालों में दमे की संभावित बीमारी का ख़तरा भी टलेगा। अरुण पुरी इस तरह के कार्यक्रम से टीआरपी नंबर लाने वालों को इनाम तो देंगे ही, लगे हाथ ऐसा सुझाव देकर वे और भी कुछ हासिल कर सकते हैं।

इस कार्यक्रम को पेश करने वाली एंकर पर वाक़ई दया आती है। दर्शक न संपादक को जानते हैं और न प्रोड्यूसर को। तस्वीर देखकर एक ने कहा—यह लड़की तो पढ़ी लिखी लगती थी !

थी !…थी..!…थी.. !…थी…!

ramdev

Courtesy: MediaVigil.com

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